सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज Sindhu Ghati Sabhyata Ki Khoj in hindi Part-1, भारतीय प्राचीन इतिहास-1(Indian Ancient history-1) प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी



                       सिंधु घाटी की सभ्यता


सिंधु सभ्यता की खोज:-

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सन् 1921 को राय बहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा नामक स्थान से सर्व प्रथम इस सभ्यता की खोज का सूत्रपात किया। फिर सन् 1922 को श्री राखलदास बनर्जी ने मोहन जोदड़ो से अन्य साक्ष्य प्राप्त किए। अतः पुरातत्ववेत्ताओं के प्रयासों से यह सभ्यता प्रकाष में आई, जिसका विस्तार उत्तर में जम्मू से अखनूर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पष्चिम में ब्लूचिस्तान के मकरान तट से लेकर उत्तर - पूर्व में मेरठ जिले तक था।




विद्वानों के मतानुसार इस सभ्यता का क्षेत्र त्रिभुजाकार था। चूकि इस सभ्यता के प्रथम साक्ष्य सिंधु क्षेत्र से प्राप्त हुए अतः मार्षल ने इसको सिंधु घाटी की सभ्यता नाम दिया। तथा डाॅ0 व्हीलर ने इसका समर्थन किया है।




सिंधु सभ्यता का प्रसार:-




फेयर सर्विस के अनुसार इस सभ्यता के निवासियों ने ऐसा स्थान चुना जहां की जलवायु गेंहू उत्पादन के लिए उपर्युक्त हो फिर भी अद्यतन खोजों पर आधारित प्रमुख स्थल निम्नलिखत हैंः-




ब्लूचिस्तान:- यहां सभ्यता के अवषेष निम्न जगहों से प्राप्त हुएः




सुत्कगेनडोर:- ईरान से लगी हुई पाकिस्तान के सीमा क्षेत्र में स्थित इस स्थल को सन् 1927 में स्टाइन ने खोजा तदुपरांत सन् 1962 को डेल्स ने यहां से बंदरगाह, दुर्ग एवं निचले नगर की रूप रेखा प्राप्त की। यह स्थल गुजरात के लोथल से मैसोपोटामिया के साथ होने वाले व्यापारिक मार्ग पर स्थित था अतः संभव है कि यहां से मछली उत्पादन एवं निर्यात का कार्य किया जाता होगा। जैसा कि वर्तमान में ब्लुचिस्तान के समुद्री क्षेत्रों से हो रहा है।


It is thought to have once been on a navigable inlet of the Arabian Sea. The usual citadel and town are present, as well as defensive walls 30 feet wide.


सोत्काकोह:- इसकी खोज सन् 1952 में डेल्स ने की।




डाबरकोट:-




सिंधु:-




मोहन जोदड़ो


सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज Sindhu Ghati Sabhyata Ki Khoj in hindi (History)




मोहन जोदड़ो अर्थात् मृतकों का टीला। मोहन जोदड़ो सिंधु सभ्यता का सर्व ज्ञात स्थल है। जो कि वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में सिंध नदी के तट पद अवस्थित है। एक समय सिंध नदी मोहन जोदड़ों के पष्चिम से प्रवाहित होती थी जो कि वर्तमान में पूर्व दिषा की ओर से प्रवाहित होती है। इस नगर का कम से कम सात बार निर्माण एवं विनाष हुआ था क्योंकि व्हीलर ने इस नगर की सात तहों का पता लगाया है। इस नगर की नवीनतम सतह का अभी तक कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है। यहां से प्राप्त अवषेष हड़प्पा की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं। पुरावषेषों से यहां वृहद स्नानागार 39 गुणा 23 गुणा 8, वृहद अन्नागार, महाविद्यालय भवन, सभा भवन आदि के विषय में महत्तवपूर्ण जानकारी प्राप्त हुईं हैं। सर जाॅन मार्षल ने इस वृहद स्नानागार को तत्कालीन विष्व का एक आष्चर्यजनक निर्माण कहा है।






इसके अतिरिक्त कांस्य निर्मित नृत रत नारी की मूर्ति , पुजारी की मूर्ति , मुद्रा पर अंकित पषुपति नाथ /षिव/ आदि महत्तवपूर्ण वस्तुएं प्राप्त हुई हैं।सन् 1921 में श्री राखलदास बनर्जी के बाद सन् 1923 - 24 में माधोस्वरूप वत्स तथा 1924 - 25 में काषीराम दीक्षित ने कार्य जारी रखा।




यहां से सूती कपड़े के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहां की अधिकाष जनता ‘‘ द्रविड़’’ थी।





हड़प्पा

- इस सभ्यता की खोज का श्री गणेष सर्वप्रथम 1921 इ्र्र0 में हड़प्पा में राय बहादुर दयाराम साहनी ने किया। रावी नदी के तट पर स्थित इस टीले की जानकारी सर्वप्रथम 1826 को चाल्र्स मर्सन तथा 1831 में कर्नल बर्न द्वारा प्राप्त हुई। यहां से नाष पाती के शक्ल के 16 अग्निकुण्ड प्राप्त हुए हैं। गोबर की राख व कोलतार के साक्ष्य भी यहां से प्राप्त हुए हैं।कांसा गलाने का प्राप्त यहां से प्राप्त हुए हैं। सभ्यता की सर्वाधिक मुहरें (891) 36.12 प्रतिषत। एकमात्र स्थान जहां से पत्थर की दो मूर्तियां प्राप्त हुईं हैं। जिनमें एक लाल पत्थर का नग्न पुरूष का धड़ है व दूसरी नर्तकी की है।12 कब्रों में से कांसे के दर्पण प्राप्त हुए हैं।




हड़प्पा सिंधु घाटी की सभ्यता का प्रमुख शहरी केन्द्र था। जो कि वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब सूबे में प्राचीन रावी नदी के तट पर अवस्थित है।



The latest research has revealed at least five mounds at Harappa that 3-D renditions of Harappa show to have been surrounded by extensive walls. Two mounds have large walls around them, perhaps as much for trade regulation as defense.

A structure once considered a granary is now thought to have been a large building with ventilated air ducts. A set of working platforms to the south of this structure are also of great interest to archaeologists.

An abundance of terracotta figurines at Harappa provided the first clues in the 19th century to the ancient Indus - often abbreviated as Harappan - civilization.






कोटदीजी:- सन् 1955 एवं 1957 में फजल अहमद खां ने यहां पर उत्खनन कराया। यहां पर एक अन्य कोटदीजी सभ्यता के भी साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।




चनुन्हदड़ो:- सिंधु तट पर मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण में सन् 1931 को ननो गोपाल मजूमदार ने सर्वप्रथम इसकी खोज का कार्य आरम्भ किया। यह प्रमुख उत्पादन केन्द्र (उंदनंिबजनतपदह बमदजमतद्ध था। फिर सन् 1935 को मैके ने उत्खनन कर मनके, सीप, अस्थि, मुद्रा एवं दवात आदि प्राप्त कर यहां की कुषल कारीगरी से अवगत कराया। यहां से मुहरें बनाने वाले धातु के औजार भी प्राप्त हुए हैं। किन्तु किसी भी तरह का दुर्ग होने का प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ हैं।




Various tool, shell, bone and seal-making facilities which involved writing were found. Beads were made using efficiently layered floors. Chanhudaro seems also to have been hastily abandoned.




पंजाबः-




रोपड़:- सन् 1955 - 56 को यज्ञदत्त शर्मा ने इस जगह का अन्वेषण किया। यहां से एक मुद्रा भी प्राप्त हुई है। साथ ही एक कब्रिस्तान एवं तांबे की कुल्हाड़ी भी प्राप्त हुई है।




बाड़ा:- यहां से कुछ मृद भाण्ड सिंधु सभ्यता से पूर्व के हैं। यहां से प्राप्त सामग्री सिंधु सभ्यता के अवनति काल का प्रतिनिधित्व करती है।




संधोल - यहां से मनके , चूड़ियां आदि प्राप्त हुए हैं।




गनवेरीवाला

गनवेरीवाला पंजाब राज्य में अवस्थित है जो कि भारत एवं पाकिस्तान की सीमावर्ती क्षेत्र के अंर्तगत है। सर्वप्रथम इस स्थल को सर आॅरेल स्टीन एवं डाॅ0 एम0आर0मुगल ने सन् 1970 में प्रकाष में लाया। यह स्थल लगभग 80 हेक्टेयर के क्षेत्र में विस्तारित है जो कि माहिन जोदड़ो से अधिक है।




यह प्राचीन सरस्वती अथवा घग्गर नदी के तट पर था। इस स्थल की दूरी हड़प्पा एवं मोहन जोदड़ो दोनों स्थलों से समान है। गनवेरीवाला सभ्यता पांचवा बड़ा नगरीय स्थल था।

सिंधु घाटी की सभ्यता का Part-2,3 पढ़ने के लिए नीचे वाली लिंक पर जाए 







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