जैन धर्म का इतिहास Jain dharm ka itihas | History of jain dharm | jain dharm pratiyogi pariksha ke liye upyogi

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी 

जैन धर्म


जैन धर्म का इतिहास:- प्राचीनता की दृष्टि से इसे वैदिक धर्म के बराबर माना जाता है, क्योंकि पहले तीर्थंकर ऋषभदेव का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जैन धार्मिक विचार धारा के अनुसार जैनियों के 24 तीर्थंकर हैं। जिनमें से दो ऋषभदेव तथा अरिष्टनेमि का उल्लेख ‘‘ ऋग्वेद ’’ में मिलता है।


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पार्शवनाथ /23 वें तीर्थंकर /

प्रतीक चिन्ह: सर्पफण

कुछ विद्वानों के अनुसार आप ही जैन धर्म के प्रवर्तक हैं।

जन्म: 817 ई0पू0

जन्म स्थान: वाराणसी

माता: वामदेवी

पिता: अश्वसेन

जैन धर्म के प्रमुख चार सिद्धांत:

1. अहिंसा

2. सत्य

3. अस्तेय

4. अपरिग्रह

जैन धर्म की विचारधारा -

 देववाद तथा यज्ञवाद में अविश्वास

 वर्ण व्यवस्था का विरोध कर सामाजिक समभाव

 इनके अनुयायी - र्निग्रंथ कहलाते हैं।

मृत्यु: 717 ई0पू0, सम्मेत शिखर / पार्शवनाथ पहाड़ी पर/

महावीर स्वामी / 24 वें तथा अंतिम तीर्थंकर/

प्रतीक चिन्ह: सिंह

जन्म: 599 ई0पू0

जन्म स्थान: वैशाली के निकट कुण्डग्राम में

माता: लिच्छवी राजमुमारी त्रिशला

पिता: नाट सरदार सिद्धार्थनाथ

बचपन का नाम: वर्धमान

पत्नी: यशोदा

पुत्री: प्रियदर्शना

कल्पसूत्र तथा आचारांग सूत्र के अनुसार महावीर ने ज्ञान प्राप्ति हेतु कठोर तप किया। 12 वर्ष पश्चात् ‘ जाम्भियग्राम ’ के समीप ‘ ऋजुपालिका ’ नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे आपको ज्ञान की प्राप्ति हुई। आपको प्राप्त सत्य ज्ञान / कैवल्य/ के कारण केवलिन कहलाए तथा अपने पराक्रम के कारण महावीर नाम से संबोधित किए गए। समस्त इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण महावीर जिन अथवा जैन कहलाए अतः महावीर के अनुयायी जैन कहतलाते हैं।

जैन धर्म प्रचार:-

 बिम्बसार तथा उसकी रानियों में जैन धर्म के प्रति आस्था थी। उत्तराध्ययन सूत्र

 अजातशत्रु महावीर का अनुयायी था। ओबाइय सूत्र

 बौद्ध धर्म, जैन धर्म का तत्कालीन प्रबल प्रतिद्वंद्वी था।

 प्रथम जैन प्रचार संघ की स्थापना पावापुरी में की गई।

महावीर के सहयोगी प्रचारक - आनंद, सुरदेव, महासयग, कुण्डकोलिय, नंदिनीपिया तथा कामदेव थे।

मृत्यु: 427 ई0पू0 को पावापुरी में ।

जैन सम्प्रदाय:-

1. दिगम्बर सम्प्रदाय: इस सम्प्रदाय के संस्थापक भद्रबाहु को माना जाता है।

2. श्वेताम्बर सम्प्रदाय: इस सम्प्रदाय के संस्थापक स्थूलभद्र थे।

विभाजन:- जैन संघ संचालन का कार्य 11 गणधरों का था जिनमें महावीर की मृत्यु के बाद मात्र एक गणधर सुधर्माचार्य ही बचा। अंतिम नन्द शासक के समय जैन संघ के दो अध्यक्ष हो गए। 1. सम्भूति विजय 2. भद्रबाहु

सम्भूति विजय के बाद स्थूलभद्र अध्यक्ष बना, इसी समय मगध में अकाल पड़ने पर भद्रबाहु शिष्यों के साथ दक्षिण भारत चले गए। इस बीच पाटलिपुत्र में प्रथम जैन सभा का आयोजन कर जैन साहित्य ‘ पूर्व तथा आगम ’ संकलित कर श्वेत वस्त्र धारण करने लगे। दक्षिण से भद्रबाहु /नग्न/ के लौटने पर दोनों में मतभेद उत्पन्न हो गए। इस प्रकार जैन संघ उक्त दो शाखाओं में विभक्त हो गया।

भगवान् महावीर की शिक्षाएं:-

महावीर ने पार्शवनाथ की चार शिक्षाओं में एक और बात ‘‘ ब्रम्हचर्य ’’ को जोड़ा।

 सर्वप्रथम वस्त्र त्याग स्वयं महावीर ने किया।

 जैनों की श्वेताम्बर शाखा अत्यंत लोकप्रिय हुई।

 तत्तकालीन समय में जैन धर्म के प्रमुख केंद्र उज्जैन तथा मथुरा थे।

 जैन साहित्य को आगम तथा तीर्थंकर को अर्हंत कहा गया है।

 जैन धर्म हिन्दू सांख्य दर्शन के निकट है।

 उपदेश काल में नालंदा में मख्खलि गोशाल से प्रथम भेंटवार्ता हुई परंतु 6 वर्ष बाद मतभेद उत्पन्न हो गए।




जैन धर्म के प्रमुख सिंद्धांत:-

 अनीश्वरवाद 

 आत्मवादिता

 निवृत्तिमार्ग

 कर्म प्रधान, पुर्नजन्म में विश्वास

 निर्वाण: इस हेतु त्रिरत्न बताए गए है।

व सम्यक दर्शन

व सम्यक ज्ञान

व सम्यक चरित्र

 कर्म: जैन धर्म में आठ प्रकार के कर्म वर्णित हैं।

 पाप: पापों की संख्या 18 बताई गई है।

अन्य विविध तथ्य

 गृहस्थ व्यक्ति निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकता।

 जैन धर्म में जाति तथा दास प्रथा के समूल नष्ट का भाव नहीं है।

 जैन धर्म में तीन गुण व्रत है।

 इसमें चार शिक्षा व्रत हैं।

 जैन संघ के सदस्य चार वर्गों में विभाजित थे। 1. भिक्षु 2. भिक्षुणी 3. श्रावक 4. श्राविका

 जैन सभाएं:-

व प्रथम जैन सभा चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल में पाटलिपुत्र में आयोजित की गई।

व अध्यक्ष:

व समय:

व विशेष : इस सभा में अंगों का संकलन किया गया।

व द्वितीय जैन सभा गुजरात के वल्लभी नामक स्थान पर हुई।

व अध्यक्ष:- देवद्धिगणि क्षमाश्रवण/ स्कंदिलाचार्य

व समय: 512 ई0पू0

व विशेष: इस सभा में आगमों का संकलन किया गया।

 19 वां तीर्थंकर ‘‘ मल्लि ’’ स्त्री थी।

 जैन धर्म में द्वैतवादी तत्व ज्ञान का समावेश है।

 महावीर के उपदेशों की भाषा जन सामान्य में प्रचलित भाषा थी।

 आजीवक सम्प्रदा के प्रवर्तक मख्खलि गोशाल थे।

 श्रावण बेलागोला में गोमतेष्वर की विशाल प्रतिमा है।

 वर्तमान में उपलब्ध सम्पूर्ण जैन साहित्य श्वेताम्बर सम्प्रदाय द्वारा रचित है, तथा इसकी भाषा आर्श या अर्धमागधी है।

 महावीर की मृत्योपरांत जैन संघ का प्रधान सुधर्मन को बनाया गया।

 विभिन्न जैन ग्रंथों में वर्णित तथ्य:-

व आचारांग सूत्र: जैन मुनियों की आचार संहिता

व भगवती सूत्र: महावीर का जीवन, महावीर-गोशाल वृत्तांत तथा 16 महाजनपदों का विवरण।

व नाया धम्मकहाओ: महावीर की शिक्षाएं

व पण्हावागरणाई: जैन के नियम

व आवश्यक तथा औपपातिक सूत्र: अजातशत्रु के धार्मिक विचार

व कल्प सूत्र: भद्रबाहु द्वारा रचित

व परिसादानिय: निग्रंथ

व कुबलयमाला: हूण नेता तोरमणण पर रचित रचना।

 श्वेताम्बरों के उप सम्प्रदाय: 1. पुजेरा 2. ढुंढिया 3. तेरापंथी

 दिगम्बरों के उपसम्प्रदाय: 1. कुमानपंथी 2. तोतापंथी 3. समैया पंथी

 श्वेताम्बर तथा दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों में समान रूप से सम्मानीय - उमा स्वाति

 जैन धर्म संबंधी साहित्य: सूत्र, उपांग, प्रर्कीणक, पूर्व, अंग तथा आगम।

 महावीर के गणधर: 1. इंद्रभूति 2. अग्निभूति 3. वायुभूति 4. मक्त 5. मण्डित 6. मेरिय पुत्र 7. मेटार्य 8. अंकपति 9. अचक्रभद्रा 10. प्रभास 11. सुधर्मन।

 चैथी सदी ई0पू0 में मथुरा जैन सभा के अध्यक्ष स्कंदिलाचार्य थे।

 तत्वार्थणिराय सूत्र की रचना उमा स्वाति ने की।

 उज्जैन में जैन धर्म प्रचारक सुहास्ति था।

 दक्षिण में जैन धर्म का आगमन भद्रबाहु के द्वारा हुआ।

 न्यायवाद का सबंध जैन धर्म से है।

 अजीव का विभाजन 1. पुदगल 2. काल 3. आकाश 4. धर्म 5. अधर्म है , जिसमें काल देश व्यापी अस्तिकण्य द्रव्यों में अपवाद है।

 अनेकांतवाद या स्यादवाद जैन धर्म के अंर्तगत हैं

 आगम साहित्य के अंर्तगत:- 12 अंग, 12 उपांग / वर्तमान में 8 उपलब्ध/ , 10 प्रकीर्ण, 6 सूत्र, 4 मूल सूत्र, अनुयोग सूत्र तथा नंदी सूत्र / दोनों जैनियों के स्वतंत्र ग्रंथ तथा विश्वकोष माने जाते हैं।/

 11 गणधरों के उपदेश 14 पर्वों में संकलित हैं।

 जैन धर्म में स्यादवाद को सप्तभंगी सिद्धांत भी कहा गया हैं

 जैन धर्म सृष्टि निर्माता के रूप में ईष्वर को नहीं मानता, उसकी मान्यता के अनुसार सृष्टि का निर्माण छः द्रव्यों जीव, पुदगल, धर्म, अधर्म आकाष तथा काल से हुआ है।

 मथुरा शैली /150 से 300 ई0पू0/ के प्रणेता मुख्य रूप से जैन धर्मावलंबी ही थे।

 जैन तीर्थंकर नेमिनाथ को श्री कृष्ण का चचेरा भाई माना जाता हैं

 पार्शवनाथ की तपोभूमि भीलवाड़ा है।
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