गुप्तोत्तर भारत का इतिहास उत्तर भारत का इतिहास - ई0 550 से ई0 650 तक

आज इस लेख में हम बात करने वाले है गुप्तोत्तर भारत उत्तर भारत का इतिहास के बारे में जिसमें उत्तर भारत की राजनैतिक स्थिति, मगध और मालवा के परवर्ती गुप्त, वल्लभी के मैत्रक, पंजाब का हूण वंश, मालवा का यशोधर्मन्, कन्नौज का मौखरि वंश, पुष्यभूति या वर्धन वंश, हर्ष की विजयें, हर्षकालीन प्रमुख विद्वान, व्हेनसांग के विवरण की कुछ विशेषताएं की कुछ विशेषताएं आदि को शामिल किया है जो आपको प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकते है।

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गुप्तोत्तर भारत उत्तर भारत ( ई0 550 से ई0 650 तक )


उत्तर भारत की राजनैतिक स्थिति : 

गुप्तों के पतन के उपरांत उत्तरी भारत की राजनैतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई तथा छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित हो गए। इन वंशों में निम्न लिखित महत्वपूर्ण थे। 


मगध और मालवा के परवर्ती गुप्त : 

परवर्ती गुप्तों के महान गुप्त शासकों से संबंधों की जानकारी का अभाव है। परवर्ती गुप्त वंश का संस्थापक कृष्ण गुप्त /510 ई0 से 523 ई0/ था। इसके बाद हर्षगुप्त एवं जीवितगुप्त हुए। ये तीनों गुप्त शासको की अधीनता में शासन करते रहे। इनमें से जीवित गुप्त/525 ई0 से 545 ई0/ जो हर्षगुप्त का पुत्र था।  ‘‘ अपसढ़ के शिलालेख ’’ में योग्य शासक बताया है। इसकी बहन उपगुप्त का विवाह मौखरिनरेश ईश्वर वर्मन के साथ हुआ था। इस वंश का स्वतंत्र शासक कुमार गुप्त था। इसने महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की। ‘‘ अपसढ़ के शिलालेख ’’ के अनुसार इसने मौखरि नरेश ईशान वर्मा को परास्त किया था। कुमारगुप्त की मृत्यु प्रयाग में हुई थी। इसका उत्तराधिकारी दामोदर गुप्त था। यह प्रतिद्वंद्वी मौखरि नरेश सर्ववर्मा के हाथों परास्त हो कर 528 ई0 में मारा गया। इसका उत्तराधिकारी महासेन गुप्त हुआ। इसने मौखरियों से भयभीत हो कर पुष्यभाति वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। तथा कामरूप के शासक भास्कर वर्मन् के पिता सुस्थित वर्मन् को लौहित्य/ब्रम्हपुत्र/ तट पर हराया। किन्तु उसे जीवन के अंतिम समय में भयंकर विपत्तियों का सामना करना पड़ा। जिससे उसे अपने प्राण और राज्य दोनों ही गवांने पड़े। अतः उसके बेटों देवगुप्त और माधवगुप्त को अपने संबंधी प्रभाकर वर्धन् की शरण में जाना पड़ा। दोनों युवक राज्यवर्धन् तथा हर्षवर्धन के घनिष्ठ मित्र हुए। अतः हर्षवर्धन के हस्तक्षेप से माधवगुप्त मगध का शासक बना। लगभग 675 ई0 को आदित्यसेन गुप्त इसका उत्तराधिकारी बना। आदित्य ने ही ‘ अपसढ़ अभिलेख ’ उत्कीर्ण कराया। हर्ष की मृत्यु के बाद यह शक्तिशाली हो गया। तथा परम भट्टारक महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। इसने तीन अश्वमेध यज्ञ किए/मंदर लेख/ । पत्नी कोण देवी ने सरोवर बनवाया। इसके समय चीनी राजदूत ‘‘ वांग-हुएन-त्से ’’ दो बार भारत आया। कोरियाई बौद्ध यात्री ‘‘ हुई - लुन ’’ के अनुसार इसने बोधगया में विहार बनवाया। नालंदा में ‘ इत्सिंग ’ से भेट की। यह स्वयं वैष्णव था। इसके बाद देवगुप्त, विष्णुगुप्त तथा जीवितगुप्त द्वितीय/अंतिम  शासक आए। तथा 725 ई0 तक मगध में इनका शासन समाप्त हो गया।


वल्लभी के मैत्रक : 

गुप्त शासक बुधगुप्त के समय उसके सामंत भट्टारक ने 475 ई0 को सौराष्ट में स्वतंत्र सत्ता कायम कर वल्लभी को अपनी राजधानी घोषित की। इसके बाद घट सेन ने सत्ता प्राप्त की किन्तु ये दोनों ही स्वयं को सेनापति ही कहते थे। तीसरे शासक द्रोण को स्वयं बुधगुप्त ने महाराज की उपाधि प्रदान की। अगले शासक ध्रुव प्रथम ने अपने दान पत्रों में महाकार्तिक, महादण्डनायक आदि विरूद ग्रहण किए। 571 ई0 के लगभग ध्रुव द्वितीय शासक बना, इसने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली। तथा हर्ष ने अपनी बेटी का विवाह इससे कर दिया। इस वंश का अंतिम शासक शिलादित्य सप्तम् था। इस पर अरबों ने आक्रमण कर मैत्रक वंश का अंत किया। तथा वलभी पर अधिकार किया। वलभी तब शिक्षा, संस्कृति, व्यापार एवं वाणिज्य का महान केन्द्र थी। वर्तमान में वल्लभी को बालाघाट ग्राम से समीकृत किया जाता है।


पंजाब का हूण वंश : 

हूणों का प्रथम आक्रमण खुशननेबाज के नेतृत्व में स्केदगुप्त के समय हुआ था। अतः वे परास्त हो कर ईरान भाग गए एवं शाह फिरोज को हरा कर अपनी राजधानी बल्ख में बनाई। तथा शनैः-शनैः गांधार  व पंजाब को भी जीत लिया। भारत में शासन करने वाला प्रथत हूण नरेश तोरमाण था। इसने 500 ई0 तथा 510 ई0 के बीच हमला किया, जिसमें भानुगुप्त का सेनापति गोपराज मारा गया तथा मालवा में इसका सामंत धान्यविष्णु था। कुवलयमाला /जैन ग्रंथ/ के अनुसार इसकी राजधानी चंद्रभागा/चिनाव/ तट पर पव्वैया थी। व्हेनसांग, मगध पर तोरमाण का शासन स्वीकार करता है। महाराजाधिराज तोरमाण की मृत्यु 512ई0/513 ई0 के लगभग हुई। इसके बाद इसका पुत्र मिहिरकुल शासक बना , जिसे क्रिष्चियन टोपोग्राफी का यवन लेखक गोल्लस कहता है। व्हेनसांग तथा सुंग-युंग इसकी राजधानी क्रमशः शाकल तथा गांधार बताते हैं। तथा इसे बौद्धों का कट्टर विनाशक कहते हैं। सर्वप्रथम इसका विरोध यशोवर्मन् ने किया तथा नरसिंहगुप्त द्वितीय से परास्त हो कर यह कश्तीर भाग गया। कश्मीर में इसकी मृत्यु हो गई। तथा भरत में हूण विलीन हो गए। मिहिरकुल शैव मत का अनुयायी था। इसे राजतंरंगिणी में विनाश का देवता तथा जैन ग्रंथों में प्रथम दुष्ट कहा है। राजपूत काल में मालवा का समीपवर्ती क्षेत्र हूण मण्डल कहलाता था। विद्वानों के अनुसार भारतीयों में निरंकुश शासन की परंपरा का प्रारंभ हूणों की ही देन है।


मालवा का यशोधर्मन् : 

मिहिरकुल का विरोध करने वाला पहला व्यक्ति यशोधर्मन् ही था। यह 530 ई0 के लगभग मालवा का शासक बना। इसकी जीवन गाथा मंदसौर के दो स्तम्भ लेखों से ज्ञात होती है। संभवतः यह प्राचीन औलिकर वंश से संबद्ध था। इसके उत्तराधिकारियों तथा पूर्वजों की जानकारी का पूर्णतः अभाव है।


कन्नौज का मौखरि वंश : 

मौखरि मूलतः गया के निवासी थे। मौर्य कालीन मिट्टी की मुहरों तथा पतंजलि के महाभाष्य से इनकी प्राचीनता का आभास होता है। प्रथम मौखरि शासक हरिवर्मा पे अपने पुत्र का विवाह परवर्ती गुप्त शासक हर्षगुप्त से किया था। किन्तु इसके संबंधों में वैमनस्यता बनीं, जो कुमारगुप्त के समय से आरंभ हुई अंततः महासेन गुप्त को मगध कात्याग कर मालवा जाना पड़ा। इस मौखरि वंश के प्रमुख शासकों में ईशानवर्मा /550 ई0 से 574 ई0/ था जो ईश्वर वर्मा का पुत्र था। इसने हरदा लेख में गौड़, आंण्र एवं सूलिकों को हराया। किन्तु  परवर्ती कुमारगुप्त से परास्त हो गया। इसका उत्तराधिकारी सर्ववर्मा/574 ई0 से 580 ई0/ हुआ , ने परवर्ती गुप्तों से मगध विजित कर लिया। अगला शासक अवन्ति वर्मा/580 ई0 से 600 ई0/ रहा। इसके समय पुष्यभूति वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित हुए क्योंकि अगला मौखरि नरेश ग्रहवर्मा/600 ई0 से 605 ई0/ का विवाह अवन्ति वर्मा ने थानेश्वर नरेश प्रभाकरवर्धन् की पुत्री राज्यश्री से किया। किन्तु कालान्तर में उत्तर मालवा के परवर्ती गुप्त शासक देवगुप्त ने कन्नोज पर हमला कर ग्रहवर्मा की हत्या कर दी/हर्षचरित/। इसके बाद हर्षवर्धन् ने अपनी राजधानी थानेश्वर से स्थानांतरित कर कन्नौज कर दी।


पुष्यभूति या वर्धन वंश : 

प्राचीन श्रीकण्ठ नामक जनपद के अंर्तगत  थानेश्वर /वर्तमान हरियाणा का कुर्नूल जिला/ में पुष्यभूति नामक व्यक्ति ने छठी सदी ई0 में वर्धन् राजवंश की नींव डाली।


जानकारी के स्त्रोत : 

व्हेनसांग तथा आर्यमंजू श्री मूलकल्प में इस वंश को वैश्य/फीनशे/ कहा है तथा हर्षचरित में चंद्रवंशी क्षत्रिय बताया है। बांसखेड़ा एवं मधुवन अभिलेख तथा सोनीपत एवं नालंदा से प्राप्त मुद्राओं से प्रारंभिक चार शासकों के नाम प्राप्त होते है।


1.     नरवर्धन् : विभिन्न स्त्रोतों के द्वारा इसे ही प्रथम वर्धन शासक माना गया है। इसकी पत्नी का नाम वज्रिणी देवी प्राप्त होता है।


2.     राज्यवर्धन : इसकी पत्नी का नाम अप्सरावर्धन था।


3.     आदित्य वर्धन : पत्नी का नाम - महासेनगुप्त देवी था।


उपरोक्त शासकों ने महाराज की उपाधि ली तथा इन्हें वैश्य ही माना गया है।


4.     प्रभाकर वर्धन् : वस्तुतः इस वंश की स्वतंत्रता का जनक प्रभाकर को ही माना जाता है। बाणभट्ट इस वंश के पुष्यभूति के उपरांत प्रभाकर का ही उल्लेख करता है। इसने परम भट्टारक एवं महाराजाधिराज की उपाधियां ली। इसने मालवा नरेश यशोधर्मन की पुत्री यशोमति से विवाह किया। तथा अपनी बेटी राज्यश्री का विवाह मौखरि नरेश अवन्तिवर्मा के पुत्र ग्रहवर्मा से किया। बाणभट्ट ने इसकी वीरता का अतिश्योक्ति पूर्ण वर्णन किया है। ‘‘ प्रभाकर वर्धन् हूण रूपी मृग के लिए सिंह, सिंधु प्रदेश के लिए जलता हुआ बुखार, गुजरात की नींद हराम करने वाला , गांधार राज रूपी हाथी का अंकुश तथा मालव देश के लिए परशु था। ’’ बाणभट्ट इसे दूसरा नाम प्रतापशील देते हैं। इस सूर्योपासक राजा की मृत्यु 605 ई0 को हुई । इसने हूणों के विरूद्ध पुत्र राज्यवर्धन् को भमजा था, जो कि सफल हुआ।


5.     राज्यवर्धन्/650 ई0 से 606 ई0/ :  जब यह हूणों के दमन में व्यस्त था तो एक दूत कुरंगक ने पिता की बीमारी का समाचार दिया। लौटने पर पिता का देहांत हो चुका था अतः विचलित हो कर इसने सन्यास ग्रहण कर लिया किन्तु हर्ष के आग्रह पर थानेश्वर का शासक बना।  इसी समय संवादक नामक दूत ने राज्यश्री एवं ग्रहवर्मा पर देवगुप्त एवं शशांक के हमले की खबर दी कि ग्रहवर्मा की हत्या कर राज्यश्री को कैद कर लिया गया है। अतः राज्यवर्धन सेना लेकर कन्नौज गया। तथा देवगुप्त को तो मार डाला किन्तु शशांक ने विश्वासघात कर राज्यवर्धन की हत्या 606 ई0 में करवा दी।


6.     हर्षवर्धन् /606 ई0 से 647 ई0/ : जब कुन्तल नामक अश्वारोही ने राज्यवर्धन की मृत्यु का समाचार सुनाया तो हर्ष की अल्पावस्था/18 वर्ष/ में दरबारी उसे शासन सौपने में झिझके किन्तु सेनापति सिंहनाद की प्रेरणा से हर्ष ने सत्ता संभाल ली। और शशांक के अंत करने की प्रतिज्ञा ली। शशांक के अभियान के पूर्व कामरूप के शासक भास्कर वर्मा ने अपना दूत हंसवेग को भेज कर हर्ष से मैत्री स्थापित की। तभी हर्ष के ममेरे भाई व सेनापति भाण्डे ने राज्यश्री के कारावास से छूटकर सती होने विंध्य के जंगल में जाने की सूचना दी। अतः हर्ष ने एक बौद्ध भिक्षु दिवाकर मित्र की सहायता से राज्यश्री को ढूढ निकाला। इस कार्य में परवर्ती गुप्त माधवगुप्त ने भी हर्ष की सहायता की। इसके बाद हर्ष वापस गंगा तट आया जहां भाण्डि के नेतत्व में सेना उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। बाणभट्ट का विवरण यहां पर समाप्त हो जाता है। अब आर्यमंजूश्री मूलकल्प के अनुसार हर्ष ने अपना प्रथम अभियान शशांक के विरूद्ध छेड़ा किन्तु सफल नहीं हुआ। शशांक बच कर निकल गया। अंततः लगभग 619 ई0 से 637 ई0 के बीच शशांक की स्वाभविके मृत्यु के उपरांत ही हर्ष उसका राज्य प्राप्त कर सका। तथा पश्चिम बंगाल का भाग भास्करवर्मा को सौंप दिया। इसके पूर्व 606 ई0 के अभियान के बाद हर्ष, राज्यश्री के साथ कन्नौज आ गया तथा कन्नौज का शासन भी संभाल लिया। हर्ष ने अपनी राजधानी कन्नौज स्थानांतरित कर दी। तथा अवलोकितेश्वर बोधिसत्व के परामर्श पर स्वयं को राजपुत्र कहा एवं शीलादित्य की उपाधि ली/सी यू की से/।


हर्ष की विजयें :


पंच प्रदेश की विजय : व्हेनसांग, हर्ष द्वारा राज्यारोहण से छः वर्षों तक /606 ई0 से 612 ई0 तक/ युद्ध करने की बात कह कर पंच भारत/पंजाब, कन्नौज, गौड़, बिहार एवं उड़ीसा/ का स्वामी कहता है।


वलभी विजय : हर्ष ने वलभी पर आक्रमण किया तब मैत्रक नरेश धु्रवसेन द्वितीय ने भड़ौच के राजा दच्छ/दुद्द द्वितीय के यहां शरण ली। अतः दच्छ की मध्यस्थता में हर्ष ने अपनी पुत्री का विवाह वलभी नरेश ध्रुव से करके उसका राज्य लौटा दिया।


गौड़ विजय : शशांक की मृत्यु के बाद हर्ष ने गौड़ की ओर दूसरा अभियान शुरू किया। तथा सफलता प्राप्त की। डॉव आर0सी0मजूमदार के अनुसार हर्ष, शशांक के बाद ही मगध एवं उड़ीसा हासिल कर सका।


पुलकेशिन द्वितीय से पराजय : एहोल प्रशस्ति के अनुसार पुलकेशिन चालुक्य ने हर्ष को नर्मदा तट पर हरा कर दक्षिण में प्रसार रोक दिया। यह घटना 630 ई0 से 634 ई0 के आसपास मानी जाती है।


नेपाल से युद्ध : नेपाल में प्रचलित हर्ष संवत के आधार पर माना जाता है कि हर्ष का आधिपत्य यहां पर था।


उड़ीसा विजय : 643 ई0 के लगभग पलकेशिन द्वितीय की मृत्यु के बाद ही हर्ष ने गंजाम जिले के कोंगोड़ा को विजित किया।


कश्मीर विजय : हुई - ली के अनुसार कश्मीर से बुद्ध के दांत लाने की इच्छा से इस पर विजय प्राप्त की।


मगध विजय : चीनी लेखक मालत्वालिन के अनुसार 641 ई0 के लगभग हर्ष ने मगधराज की उपाधि ली।


शासन प्रबंध :


केन्द्रीय शासन :


राजा : यह सर्वोच्च शासनाधिकारी होता था। हर्षचरित में हर्ष को सभी देवताओं का सम्मिलित अवतार कहा गया है। हर्ष अत्यंत प्रजा वत्सल राजा था।


मंत्रि परिषद : हर्ष का राजा बनना मंत्रि परिषद की मंत्रणा का ही परिणाम था। आमात्य/मंत्री/ व प्रधानामात्य/प्रधानमंत्री/ इसके पद थे।


राजस्व : भू - राजसव /भाग/ आय का प्रमुख स्त्रोत था। जो 1/6 अन्न के रूप में लिया जाता था। अन्य कर थे - हिरण्य/नगद कर/, बलि/धार्मिक कर/,तुल्य मेय, भूत पात आदि कर वसूलने का कार्य भौगिक के द्वारा किया जाता। तथा जमीन का बही खाता पुस्तपाल नामक अधिकारी देखता था। राजकीय भूमि से प्राप्त आय को चार भागों में व्यय किया जाता था।


न्याय व्यवस्था : न्याय की दिव्य प्रथा प्रचलित थी। महापरमात्र, मीमांसक, चौरोद्धारणिक, दुःसाध्य साधनिक प्रमुख न्यायिक अधिकारी थे।


प्रांतीय प्रशासन :


मुक्ति/प्रांत/ का शासक लोकपाल कहलाता था। तथा विषय का शासक विषयपति होता था। विषयपति की सहयोगी परिषद में गुप्तकाल की तुलना में पांचवा सदस्य पुस्तपाल को जोड़ा गया। विषय, पठकों /तहसील/ तथा पठक, ग्रामों में विभक्त थे।


शेष शासन व्यवस्था गुप्त शासको के ही समान थी।


हर्षचरित में वर्णित प्रमुख अधिकारी :


अवन्ति : युद्ध एवं संधि वार्ता का प्रधान।


सिंहनाद : सेनापति


कुंतल : घुड़सवार सेना का प्रधान


स्कंदगुप्त : गजसेना का प्रधान


सामंत महाराज : प्रशासकीय हिसाब


दीर्गाध्वज : राजकीय संदेश वाहक


सर्वगत : गुप्तचर


सामाजिक जीवन : गुप्त युगीन


आर्थिक जीवन : कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था थी। सिंचाई हेतु तुला यंत्र का प्रयोग करते थे। प्रयाग, बनारस व कन्नौज प्रमुख नगर थे। मथुरा, सूती वस्त्र का केन्द्र था। पूर्वी तट पर ताम्रलिप्ती प्रमुख बंदरगाह था। हर्षचरित में उज्जैनवासियों को कोट्याधीश या करोड़पति कहा है।


हर्ष का धर्म : हर्ष शैव था परन्तु दिवाकर मित्र तथा तथा व्हेनसांग के संपर्क से हर्ष का झुकाव क्रमशः हीनयान - महायान की ओर हो गया।


कन्नौज की बौद्ध सभा : इसे पांचवीं बौद्ध संगीति भी कहा जाता है। व्हेनसांग/महायानी/ इसका अध्यक्ष था। यह सभा बीस दिन चली इसमें ब्राम्हणों ने अपना रोष प्रकट किया था।


प्रयाग धर्म सभा : इस सर्वधर्म सभा को महामोक्षपरिषद कहा जाता था। इसका आयोजन प्रति पांच वर्ष में किया जाता था। इस छठवें आयाजन में व्हेनसांग ने भी भाग लिया जो 75 दिन चली। यहां पर हर्ष ने दानशीलता का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।


शिक्षा एवं साहित्य : हर्ष के दरबार में विद्वानों का जमघट रहता था। हर्ष आय का चौथा भाग शिक्षा एवं साहित्य पर व्यय करता था। हर्ष ने स्वयं नागानंद, रत्नावलि तथा प्रियदर्शिका संस्कृत में लिखीं। हर्षचरित, कादम्बरी/बाणभट्ट/, सूर्यशतक/बाणभट्ट का ससुर, मयूर/ ।


हर्षकालीन प्रमुख विद्वान :


        कुमारिल भट्ट : ये पूर्व मीमांसा के विद्वान थे।


        शीलभद्र : आप नालंदा विश्वविद्यालय/वर्तमान बड़गांव,बिहार/ के                  कुलपति थे।


        जयसेन : शब्दविधा, भूगोल, गणित एवं चिकित्सा शास्त्र का प्रकाण्ड              पण्डित था।


        चन्द्रगोमिन : तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रथम प्रचारक था।


        शांत रक्षित : आपके निर्देशन में तिब्बत में प्रथम बौद्ध मठ का निर्माण हुआ।


        पद्म संभव : इस कश्मीरी भिक्षु ने शांत रक्षित को तिब्बत मे सहयोग किया।


        दिवाकर मित्र : विंध्य के वन स्थित महाविद्यालय का प्रधान था।


इस समय सर्व प्रमुख शिक्षा का केन्द्र नालंदा था। जिसे अभिलेखों में महा गह्हार कहा गया है।


ग्यारहवीं सदी के विद्वान कवि ‘‘ सोलह ’’ ने अपने ग्रंथ अवन्तिसुंदरी कथा में हर्ष को कवीन्द्र कहा है। कुछ विद्वान हर्ष की रचनाओं को बाण द्वारा तथा कुछ कवि ‘‘ धावक ’’ द्वारा लिखित मानते हैं।


चीनी दूत मण्डल : 641 ईस्वी को हर्ष तथा चीनी सम्राट ने अपने दूत परस्पर भेजे। तथा व्हेनसांग से मिलने के बाद हर्ष ने पुनः एक दूत मण्डल भेजा तब 643 ई0 को चीन से भी दूसरा दूत मण्डल आया। फिर व्हेनसांग के चीन पहुंचने के बाद तीसरा दूत मण्डल वांग - व्हेन - त्से के नेतृत्व में चीन से रवाना हुआ। किन्तु जब वह भारत पहुंचा तो हर्ष की मृत्यु हो चुकी थी। परवर्ती गुप्त आदित्य सेन ने वांग - व्हेन - त्से को अपना सहयोग दिया था।


चीन जाने वाले विद्वान : कुमारजीव, परमार्थ, शुभाक तथा धर्मदेव।


तिब्बत जाने वाले विद्वान : कमल शील, स्थिरमति, बुद्धकीर्ति।


राजधानी परिवर्तन : राज्यवर्धन की मृत्ययापरांत शशांक ने देवगुप्त के भाई सूरसेन को कन्नौज का शासक बनाया। हर्ष ने उससे कन्नौज छीना तथा 612 ई0 को अपनी राजधानी थानेश्वर से कन्नौज लाया। व्हेनसांग शुरू से ही हर्ष की राजधानी कन्नौज को बताता है।


हर्ष के उत्तराधिकारी : 647 ई0 को हर्ष बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु को प्राप्त हुआ तो सत्ता उसके मंत्री अर्जुन या अरूणाश्व ने हड़प ली। चीनी ग्रंथ अर्जुन तथा वांग-व्हेन-त्से के संघर्ष का उल्लेख भी करते हैं।


व्हेनसांग , कुछ तथ्य : व्हेनसांग चीन के होनान-फू का रहने वाला था। इसका मूल नाम चिन-सी था। यह बोद्ध तीर्थयात्री के रूप में भारत आया। विद्वानों ने इसे यात्रियों का राजकुमार, नीति का पण्डित तथा वर्तमान शाक्यमुनि की संज्ञा दी है। हर्षवर्धन की इससे प्रथम भेट पश्चिम बंगाल में हुई। हर्ष के पूर्व यह भास्करवर्मा का मेहमान था। व्हेनसांग का भ्रमण वृतांत तीन रूपों में प्राप्त है। 1. स्व रचित ‘‘सी-यू-की’’/पश्चिम संसार का विवरण/ 2. शेन-हुई-ली रचित व्हेनसांग की जीवनी 3. व्हेनसांग के शिष्य द्वारा रचित ‘‘कान-चू’’।


व्हेनसांग के विवरण की कुछ विशेषताएं :-


-  कन्नौज/कान्यकुब्ज/ को नगर महोदयश्री कहा है।


-  हर्ष की तुलना शक्र/इन्द्र/ से की है।


-  चौदह वर्षीय भारत प्रवास के दौरान आठ वर्ष कन्नौज में रहा।


-  चीन के सियान प्रांत में समाधि ली।


-  मनुस्मृति में वर्णित राजत्व का दैवीय सिद्धांत गुप्त युग तक लोकप्रिय नहीं रहा। बाणभट्ट ने इसका स्पष्ट तिरस्कार किया है। इस समय राजा वर्णाश्रम धर्म का रक्षक बन गया था।



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